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Bihar private school rules : बिहार में निजी स्कूलों की मान्यता के लिए नई एसओपी लागू,जानिए कितने टीचर और क्या-क्या सुविधाएं अब होगी जरूरी

बिहार सरकार ने निजी प्रारंभिक स्कूलों की मान्यता के लिए नई एसओपी जारी की है। इसमें शिक्षक-छात्र अनुपात, बुनियादी सुविधाएं और शैक्षणिक दिनों के स्पष्ट नियम तय किए गए हैं।

1st Bihar Published by: First Bihar Updated Jan 09, 2026, 7:44:20 AM

Bihar private school rules : बिहार में निजी स्कूलों की मान्यता के लिए नई एसओपी लागू,जानिए कितने टीचर और क्या-क्या सुविधाएं अब होगी जरूरी

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Bihar private school rules : बिहार सरकार ने राज्य के निजी प्रारंभिक विद्यालयों के संचालन और मान्यता प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और गुणवत्तापूर्ण बनाने के उद्देश्य से नई मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) लागू कर दी है। शिक्षा विभाग ने यह एसओपी नि:शुल्क और अनिवार्य बाल अधिकार अधिनियम (आरटीई) के प्रावधानों को प्रभावी ढंग से लागू करने के मकसद से तैयार की है। इसके तहत अब निजी स्कूलों को मान्यता देने से पहले शिक्षकों की संख्या, छात्र-शिक्षक अनुपात, शैक्षणिक सुविधाएं और आधारभूत संरचना से जुड़े स्पष्ट मानकों का पालन करना अनिवार्य होगा।


नई व्यवस्था के अनुसार, प्रत्येक निजी प्रारंभिक विद्यालय की मान्यता के लिए जिला शिक्षा अधिकारी (डीईओ) के नेतृत्व में तीन सदस्यीय कमेटी गठित की जाएगी। यह कमेटी स्कूल में उपलब्ध शैक्षणिक और भौतिक सुविधाओं की जांच करेगी और एसओपी के अनुरूप पाए जाने पर ही मान्यता की अनुशंसा करेगी। शिक्षा विभाग का मानना है कि इस कदम से निजी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता सुधरेगी और बच्चों को सुरक्षित व अनुकूल शैक्षणिक वातावरण मिलेगा।


प्राथमिक कक्षाओं के लिए शिक्षक संख्या तय

प्राथमिक शिक्षा निदेशालय द्वारा जारी एसओपी के अनुसार, कक्षा एक से पांच तक की मान्यता के लिए नामांकित छात्रों की संख्या के आधार पर शिक्षकों की न्यूनतम संख्या तय की गई है। यदि स्कूल में 60 तक बच्चे नामांकित हैं तो कम से कम दो शिक्षक अनिवार्य होंगे। 61 से 90 बच्चों के लिए तीन शिक्षक, 91 से 120 बच्चों के लिए चार शिक्षक और 121 से 200 बच्चों के बीच नामांकन होने पर पांच शिक्षकों की आवश्यकता होगी। इसके अलावा, 150 बच्चों पर पांच शिक्षक के साथ एक प्रधानाध्यापक की नियुक्ति भी अनिवार्य कर दी गई है।


यदि स्कूल में 200 से अधिक बच्चे नामांकित हैं, तो प्रधानाध्यापक को छोड़कर छात्र-शिक्षक अनुपात 40:1 से अधिक नहीं होना चाहिए। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि प्रत्येक छात्र को पर्याप्त ध्यान मिल सके और पढ़ाई का स्तर बेहतर बना रहे।


मध्य कक्षाओं के लिए अलग मानक

कक्षा छह से आठ तक के लिए भी शिक्षा विभाग ने स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए हैं। एसओपी के अनुसार, इन कक्षाओं में प्रत्येक कक्षा के लिए कम से कम एक शिक्षक की नियुक्ति जरूरी होगी। विज्ञान और गणित, सामाजिक अध्ययन और भाषा विषयों के शिक्षक अनिवार्य किए गए हैं। साथ ही, प्रत्येक 35 छात्रों पर कम से कम एक शिक्षक होना चाहिए। जिन स्कूलों में 100 से अधिक बच्चे नामांकित हैं, वहां पूर्णकालिक प्रधानाध्यापक की नियुक्ति अनिवार्य होगी। इसके अतिरिक्त, कला शिक्षा, स्वास्थ्य एवं शारीरिक शिक्षा तथा कार्य शिक्षा के लिए अंशकालिक शिक्षकों की व्यवस्था भी जरूरी कर दी गई है, ताकि बच्चों का सर्वांगीण विकास सुनिश्चित किया जा सके।


भवन और सुविधाओं पर भी सख्ती

एसओपी में केवल शिक्षकों की संख्या ही नहीं, बल्कि विद्यालय की बुनियादी सुविधाओं पर भी खास जोर दिया गया है। हर शिक्षक के लिए कम से कम एक कक्षा कक्ष और प्रधानाध्यापक के लिए कार्यालय सह भंडार कक्ष होना जरूरी होगा। स्कूल तक पहुंचने में बच्चों को किसी प्रकार की बाधा नहीं होनी चाहिए।


विद्यालय परिसर में लड़कों और लड़कियों के लिए अलग-अलग शौचालय, स्वच्छ पेयजल की सुविधा, दोपहर का भोजन पकाने के लिए रसोई, खेल का मैदान और चारदीवारी का होना अनिवार्य किया गया है। शिक्षा विभाग का कहना है कि ये सुविधाएं बच्चों की सुरक्षा और स्वास्थ्य के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।


शैक्षणिक दिवस और शिक्षण घंटे भी निर्धारित

नई एसओपी के तहत शैक्षणिक सत्र में कार्य दिवस और शिक्षण घंटे भी तय कर दिए गए हैं। कक्षा एक से पांच तक के लिए एक शैक्षणिक सत्र में कम से कम 200 कार्य दिवस और 800 शिक्षण घंटे अनिवार्य होंगे। वहीं, कक्षा छह से आठ के लिए 220 कार्य दिवस और प्रति वर्ष एक हजार शिक्षण घंटे का प्रावधान किया गया है।


गुणवत्ता सुधार की दिशा में बड़ा कदम

शिक्षा विभाग के अधिकारियों का मानना है कि यह नई एसओपी निजी स्कूलों में मनमानी पर रोक लगाएगी और बच्चों को बेहतर शिक्षा सुनिश्चित करेगी। नियमों के सख्त अनुपालन से न सिर्फ शिक्षक-छात्र अनुपात संतुलित रहेगा, बल्कि स्कूलों की आधारभूत संरचना भी मजबूत होगी। कुल मिलाकर, बिहार सरकार का यह कदम राज्य में प्रारंभिक शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।