1st Bihar Published by: First Bihar Updated Mar 28, 2026, 1:33:56 PM
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भारतीय मुद्रा भारतीय रुपया इन दिनों लगातार दबाव में है और अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 95 के करीब पहुंच चुकी है। यह गिरावट सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर आम लोगों की जेब और देश की अर्थव्यवस्था पर भी साफ दिखाई दे रहा है। अंतरबैंक विदेशी मुद्रा बाजार में रुपया हाल ही में 94.85 प्रति डॉलर के स्तर तक लुढ़क गया, जो अब तक के सबसे निचले स्तरों में से एक है। इससे पहले भी यह 93.96 के स्तर तक गिर चुका था, जो लगातार कमजोरी का संकेत देता है।
आर्थिक चिंता के बीच निवेश का नया मौका
जहां एक तरफ रुपये की गिरावट चिंता बढ़ा रही है, वहीं दूसरी ओर यह निवेशकों के लिए एक नया अवसर भी बनकर सामने आई है। करेंसी मार्केट को समझने वाले निवेशक अब विदेशी मुद्राओं में निवेश को ज्यादा फायदेमंद मान रहे हैं। खासतौर पर डॉलर होल्ड करना या अन्य मजबूत विदेशी करेंसी में पैसा लगाना अब पारंपरिक फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) के मुकाबले बेहतर विकल्प बनता जा रहा है।
विदेशी मुद्राओं ने दिया शानदार रिटर्न
पिछले एक साल के आंकड़ों पर नजर डालें तो मार्च 2025 से मार्च 2026 के बीच कई विदेशी मुद्राओं ने रुपये के मुकाबले मजबूत प्रदर्शन किया है। ऑस्ट्रेलियाई डॉलर में 20 प्रतिशत से अधिक की तेजी देखी गई, जो सबसे ज्यादा रही। इसके अलावा यूरो में करीब 18 प्रतिशत, ब्रिटिश पाउंड में 13 प्रतिशत से ज्यादा और न्यूजीलैंड डॉलर में भी दो अंकों की बढ़त दर्ज की गई। अमेरिकी डॉलर खुद भी करीब 10 प्रतिशत तक मजबूत हुआ है। इससे यह साफ होता है कि विदेशी करेंसी में निवेश करने वालों को बेहतर रिटर्न मिला।
कैसे कर सकते हैं विदेशी करेंसी में निवेश?
भारतीय रिजर्व बैंक की लिबरलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम (LRS) के तहत भारतीय नागरिकों को सालाना 2.5 लाख डॉलर तक की विदेशी मुद्रा खरीदने की अनुमति है। यह एक कानूनी और सुरक्षित तरीका है, जिसके जरिए आम लोग भी डॉलर या अन्य करेंसी में निवेश कर सकते हैं।
इसके लिए HDFC Bank, ICICI Bank जैसे बैंक या BookMyForex जैसे प्लेटफॉर्म का सहारा लिया जा सकता है। मल्टी-करेंसी अकाउंट खोलकर निवेशक ऑनलाइन डॉलर खरीद सकते हैं और जब रेट बढ़े तो उसे बेचकर मुनाफा कमा सकते हैं।
FD से क्यों अलग और बेहतर माना जा रहा है?
विदेशी मुद्रा में निवेश की एक बड़ी खासियत यह है कि इसमें FD की तरह कोई लॉक-इन पीरियड नहीं होता। यानी निवेशक जब चाहे अपना पैसा निकाल सकता है। पिछले 10 वर्षों में रुपये में करीब 41 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है, जो औसतन 6-7 प्रतिशत सालाना FD रिटर्न से ज्यादा मानी जाती है। इस कारण अब लोग पारंपरिक निवेश के बजाय नए विकल्पों की ओर रुख कर रहे हैं।
रुपये की गिरावट के पीछे क्या हैं वजहें?
रुपये में गिरावट के पीछे कई बड़े कारण जिम्मेदार हैं। सबसे प्रमुख वजह कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें हैं, जिससे भारत का आयात बिल बढ़ता है और मुद्रा पर दबाव आता है। इसके अलावा विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली और पश्चिम एशिया में जारी तनाव भी अहम कारण हैं। वैश्विक स्तर पर डॉलर की मजबूती भी रुपये को कमजोर बना रही है।
आगे क्या संकेत दे रहे हैं हालात?
विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट नहीं आती और वैश्विक हालात स्थिर नहीं होते, तब तक रुपये पर दबाव बना रह सकता है। ऐसे में आने वाले समय में और उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है।
निवेशकों के लिए क्या है सीख?
यह समय उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण है जो अपने निवेश को बेहतर बनाना चाहते हैं। सही जानकारी और रणनीति के साथ विदेशी मुद्रा में निवेश एक अच्छा विकल्प साबित हो सकता है। हालांकि, इसमें जोखिम भी जुड़े होते हैं, इसलिए सोच-समझकर कदम उठाना जरूरी है।