Supreme Court Verdict: समुदाय से बाहर शादी पर बेटी को पिता की संपत्ति में नहीं मिलेगा हिस्सा, कोर्ट ने सुनाया फैसला

Supreme Court Verdict: समुदाय से बाहर शादी करने के चलते एक महिला को अपने पिता की संपत्ति से बाहर कर दिया गया, और अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अंतिम फैसला सुनाया है। शायला जोसेफ नाम की महिला ने अपने पिता...।

1st Bihar Published by: First Bihar Updated Fri, 19 Dec 2025 08:30:35 AM IST

Supreme Court Verdict

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Supreme Court Verdict: देश में हर दिन हजारों मामले अदालतों में सुनवाई के लिए आते हैं, लेकिन कुछ ऐसे मामले होते हैं जो समाज में अपनी छाप छोड़ देते हैं। हाल ही में ऐसा ही एक मामला सामने आया है, जिसे जानकर आप भी हैरान रह जाएंगे।  दरअसल,  समुदाय से बाहर शादी करने के चलते एक महिला को अपने पिता की संपत्ति से बाहर कर दिया गया, और अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अंतिम फैसला सुनाया है। शायला जोसेफ नाम की महिला ने अपने पिता एनएस श्रीधरन की संपत्ति में बराबर का हिस्सा पाने के लिए हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट में अपील की थी, लेकिन शीर्ष न्यायालय ने उसकी याचिका खारिज कर दी है। कोर्ट ने कहा कि वादी का पिता की संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं है और वसीयत में लिखी अंतिम इच्छा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाएगी।


सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस एहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस के विनोद चंद्रन की बेंच ने मामले की सुनवाई की। जस्टिस चंद्रन ने फैसले में स्पष्ट किया, “साबित हो चुकी वसीयत में किसी भी तरह का दखल नहीं दिया जा सकता। हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट के फैसले रद्द किए जाते हैं। वादी (शायला) का अपने पिता की संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं है, जो वसीयत के माध्यम से अन्य भाई-बहनों को दे दी गई है।”


शायला के वकील पीबी कृष्णन ने अदालत से कहा कि उनके मुवक्किल का पिता की संपत्ति में 1/9वां हिस्सा है, जो संपत्तियों के कुल बंटवारे में बहुत छोटा हिस्सा है। इस पर बेंच ने कहा कि एक व्यक्ति की अपनी संपत्ति के बंटवारे के मामले में समानता का अधिकार लागू नहीं होता। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि वसीयत लिखने वाले की इच्छा सर्वोच्च होती है और अदालत उसे बदलने या अस्वीकार करने के अधिकार में नहीं है।


सुप्रीम कोर्ट ने शायला के भाई-बहनों की अपील को स्वीकार किया और उस मुकदमे को खारिज कर दिया जिसमें शायला पिता की संपत्ति में बराबर हिस्सा चाह रही थीं। बेंच ने कहा, “वसीयत में लिखी बातों पर सावधानी का नियम लागू नहीं किया जा सकता, क्योंकि संपत्ति का पूरा अधिकार वसीयत लिखने वाले के पास है। अगर सभी भाई-बहनों को वसीयत के जरिए बाहर किया गया होता, तो अदालत की तरफ से सावधानी नियम लागू किया जा सकता था।”


कोर्ट ने यह भी कहा कि शायला को संपत्ति में हिस्सा न मिलने का कारण यह है कि वसीयत लिखने वाले की अंतिम इच्छा और निर्णय उनके खुद के तर्कों पर आधारित था। “हम वसीयत लिखने वाले की जगह अपने विचार नहीं थोप सकते। उनकी इच्छा अंतिम और निर्णायक है,” अदालत ने स्पष्ट किया। इस फैसले से स्पष्ट हो गया कि वसीयत की अंतिम इच्छा कानून के नजरिए से सर्वोच्च होती है और परिवारिक संबंध या सामाजिक मानदंड संपत्ति के बंटवारे में प्राथमिकता नहीं पा सकते।