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Success Story Bihar : एक शब्द भी हाथों से नहीं लिखा फिर भी बिहार की बेटी बनीं डॉक्टर; जानिए क्या है इनकी सफलता की कहानी

Success Story Bihar : बिहार के पूर्णिया की रूपम कुमारी ने जन्म से दोनों हाथ न होने के बावजूद हार नहीं मानी। पैरों से लिखना सीखकर NET पास किया और आज PhD कर रही हैं। उनका संघर्ष लाखों को प्रेरणा देता है।

1st Bihar Published by: First Bihar Updated Jan 03, 2026, 2:39:37 PM

Success Story Bihar : एक शब्द भी हाथों से नहीं लिखा फिर भी बिहार की बेटी बनीं डॉक्टर; जानिए क्या है इनकी सफलता की कहानी

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Success Story Bihar : बिहार की धरती ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि संसाधनों की कमी और शारीरिक चुनौतियां कभी भी मजबूत हौसलों को रोक नहीं सकतीं। पूर्णिया जिले के एक छोटे से गांव में जन्मी रूपम कुमारी की जीवन यात्रा संघर्ष, साहस और अदम्य इच्छाशक्ति की मिसाल है। जन्म से ही दोनों हाथ न होने के बावजूद रूपम ने कभी खुद को कमजोर नहीं माना। उन्होंने हालात से समझौता करने के बजाय उनसे लड़ने का रास्ता चुना और आज वह पीएचडी कर रही हैं। पीएचडी पूरी होते ही उनके नाम के आगे ‘डॉक्टर’ जुड़ जाएगा।


रूपम का बचपन आसान नहीं था। बिना हाथों के जन्म लेने के कारण रोजमर्रा के छोटे-छोटे काम भी उनके लिए बड़ी चुनौती थे। गांव में रहने के कारण संसाधन सीमित थे और सामाजिक सोच भी कई बार निराश करने वाली रही। लेकिन परिवार के सहयोग और खुद के मजबूत हौसले ने उन्हें टूटने नहीं दिया। धीरे-धीरे उन्होंने अपने पैरों से काम करना सीख लिया और पढ़ाई को ही अपनी ताकत बना लिया।


शिक्षा के रास्ते पर चलना उनके लिए सबसे कठिन चुनौती थी। हाथ न होने के कारण किताब पकड़ना और लिखना नामुमकिन सा लगता था, लेकिन रूपम ने हार नहीं मानी। उन्होंने पैरों से लिखने का अभ्यास शुरू किया। शुरुआत में यह बेहद मुश्किल था, लेकिन लगातार मेहनत और अभ्यास ने इस असंभव को संभव बना दिया। 2009 में उन्होंने कक्षा 10 की परीक्षा सफलतापूर्वक पास की। यह उनके जीवन का पहला बड़ा मोड़ था, जिसने उन्हें आगे बढ़ने का आत्मविश्वास दिया।


इसके बाद रूपम ने इंटरमीडिएट और फिर कॉलेज की पढ़ाई पूरी की। हर परीक्षा उनके लिए एक नई चुनौती लेकर आती थी, लेकिन उनका हौसला हर बार और मजबूत होकर सामने आया। कॉलेज के दिनों में ही उन्होंने उच्च शिक्षा का सपना देख लिया था। उन्होंने राष्ट्रीय स्तर की कठिन परीक्षा NET (नेशनल एलिजिबिलिटी टेस्ट) की तैयारी शुरू की और कड़ी मेहनत के बाद इसे भी पास कर लिया। यह उपलब्धि किसी भी सामान्य छात्र के लिए बड़ी होती है, लेकिन रूपम के लिए यह असाधारण थी।


वर्तमान में रूपम कुमारी भूपेंद्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय से पीएचडी कर रही हैं। पीएचडी पूरी होने के बाद उन्हें डॉक्टरेट की उपाधि मिलेगी और वह आधिकारिक रूप से ‘डॉक्टर’ कहलाएंगी। यह उपलब्धि सिर्फ उनकी नहीं, बल्कि उन तमाम लोगों की जीत है जो किसी न किसी चुनौती से जूझ रहे हैं।


अपनी पढ़ाई और परिवार की आर्थिक मदद के लिए रूपम ने अपने गांव के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया। पैरों से लिखते हुए बच्चों को पढ़ाना गांव के लिए भी एक प्रेरणादायक दृश्य था। उनकी शादी हो चुकी है और उनके पति एक प्राइवेट टीचर हैं। पति और परिवार का पूरा सहयोग उन्हें लगातार आगे बढ़ने की ताकत देता है।


आज रूपम कुमारी की कहानी सोशल मीडिया पर लोगों को प्रेरित कर रही है। उनका जीवन यह संदेश देता है कि असली ताकत शरीर के अंगों में नहीं, बल्कि इंसान की सोच, मेहनत और आत्मविश्वास में होती है। रूपम ने यह साबित कर दिया है कि अगर इरादे मजबूत हों तो कोई भी बाधा रास्ता नहीं रोक सकती। उनकी यह संघर्ष से सफलता तक की यात्रा हजारों युवाओं, खासकर दिव्यांगजनों के लिए उम्मीद की नई रोशनी बनकर सामने आई है।