1st Bihar Published by: First Bihar Updated Apr 03, 2026, 4:57:56 PM
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सात राज्यों में कई दशकों तक सक्रिय रहे कुख्यात नक्सली और भाकपा माओवादी संगठन के वरिष्ठ नेता प्रशांत बोस उर्फ किशन दा का शुक्रवार सुबह निधन हो गया। उसने राजेंद्र इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (रिम्स) में अंतिम सांस ली। वह लंबे समय से बीमार चल रहा था और इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती था। करीब 75 वर्ष की उम्र में उसकी मौत हुई।
प्रशांत बोस का नाम उन गिने-चुने नेताओं में शामिल रहा, जिन्होंने नक्सल आंदोलन को जमीनी स्तर से खड़ा होते देखा और उसे दशकों तक दिशा दी। वह मूल रूप से पश्चिम बंगाल का रहने वाला था, लेकिन उसकी सक्रियता कई राज्यों में फैली हुई थी। संगठन के भीतर उसे ‘किशन दा’ और ‘मनीष’ के नाम से जाना जाता था।
नक्सल आंदोलन के शुरुआती दौर से उसका जुड़ाव रहा। उसने 1960 के दशक में नक्सली विचारधारा को अपनाया था। उस समय देश के कई हिस्सों में यह आंदोलन अपनी जड़ें जमा रहा था। उसने माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर (एमसीसी) के संस्थापक सदस्यों में अहम भूमिका निभाई और धीरे-धीरे संगठन के बड़े नेताओं में शामिल हो गया।
साल 2004 में जब एमसीसी और पीपुल्स वार ग्रुप का विलय हुआ, तब भाकपा माओवादी का गठन हुआ। इस संगठन में भी उसकी पकड़ मजबूत रही। वह केंद्रीय समिति और पोलित ब्यूरो का सदस्य बना, जो किसी भी नक्सली संगठन में सबसे ऊंचे स्तर का पद माना जाता है। इस तरह उसने संगठन में लंबे समय तक रणनीतिक और नेतृत्व की भूमिका निभाई।
प्रशांत बोस का प्रभाव कई राज्यों में फैला हुआ था। बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में उसकी सक्रियता दर्ज की गई थी। पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, उसके खिलाफ करीब 100 मामले दर्ज थे, जिनमें लूट, हमले और सुरक्षाबलों पर हमले जैसे गंभीर आरोप शामिल थे। झारखंड में ही उसके खिलाफ लगभग 50 केस दर्ज थे। सुरक्षा एजेंसियां उसे कई बड़े नक्सली हमलों का मास्टरमाइंड मानती रही हैं।
साल 2021 में दिवाली के दिन धनबाद के तोपचांची क्षेत्र में पुलिस कैंप पर हुए हमले में भी उसका नाम सामने आया था। इस हमले में कई जवान शहीद हुए थे और नक्सली हथियार लूटकर फरार हो गए थे। इस घटना के बाद सुरक्षा एजेंसियों ने उसके खिलाफ अभियान और तेज कर दिया था। उसकी तलाश कई वर्षों से जारी थी और वह लंबे समय तक गिरफ्तारी से बचता रहा।
प्रशांत बोस को पकड़ना सुरक्षा एजेंसियों के लिए एक बड़ी चुनौती बना हुआ था। करीब 40 साल तक वह पुलिस की नजरों से बचता रहा और लगातार अपने ठिकाने बदलता रहा। वह पारसनाथ की पहाड़ियों, सारंडा के जंगलों, हजारीबाग, बोकारो और अन्य दुर्गम इलाकों में सक्रिय रहा। कई बार घेराबंदी के बावजूद वह बच निकलने में कामयाब रहा, जिससे उसकी छवि एक चालाक और अनुभवी नक्सली नेता की बनी रही।
आखिरकार 12 नवंबर 2021 को झारखंड पुलिस ने उसे जमशेदपुर के पास कांड्रा टोल ब्रिज से गिरफ्तार कर लिया। उस समय उसकी पत्नी शीला मरांडी भी उसके साथ थी, जिसे भी हिरासत में लिया गया था। उसकी गिरफ्तारी को नक्सल विरोधी अभियान की एक बड़ी सफलता माना गया था। इसके बाद उसे बिरसा मुंडा केंद्रीय कारागार में रखा गया, जहां से उसका इलाज भी चलता रहा।
बताया जाता है कि वर्ष 2018 में उसे लकवा मार गया था, जिसके बाद उसकी सेहत लगातार गिरती गई। जेल में रहते हुए वह धीरे-धीरे सक्रिय जीवन से दूर होता गया। अंतिम दिनों में उसने खुद को पढ़ाई और धार्मिक ग्रंथों तक सीमित कर लिया था। खासतौर पर वह भगवद गीता पढ़ता था और अपना अधिकतर समय अध्ययन में बिताता था।
प्रशांत बोस की मौत को नक्सल आंदोलन के एक लंबे दौर के अंत के रूप में देखा जा रहा है। उसने करीब पांच दशकों तक इस आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई और कई बड़े फैसलों का हिस्सा रहा।