1st Bihar Published by: First Bihar Updated Sun, 25 Jan 2026 07:46:20 AM IST
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Bihar Police : बिहार पुलिस की चुस्ती, तत्परता और पेशेवर कार्यशैली के दावे अक्सर सरकारी मंचों और प्रेस विज्ञप्तियों में सुनाई देते हैं। लेकिन जमीनी हकीकत कई बार इन दावों को कठघरे में खड़ा कर देती है। पटना के चित्रगुप्त नगर थाना क्षेत्र में नीट की तैयारी कर रही एक छात्रा की संदिग्ध मौत का मामला बिहार पुलिस की कार्यशैली, जांच प्रक्रिया और सूचना तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े करता है। यह मामला केवल एक छात्रा की मौत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दिखाता है कि कैसे बिना पूरी जांच और वैज्ञानिक प्रमाण के ही पुलिस किसी नतीजे पर पहुंच जाती है और उसी अधूरी जानकारी को मीडिया के जरिए सार्वजनिक कर देती है।
इस मामले में ताजा अपडेट यह है कि FSL रिपोर्ट आने के बाद पटना पुलिस ने बड़ी कार्रवाई की है। इस मामले में चित्रगुप्तनगर थाना कांड संख्या 14/26 की जांच के बाद 2 पुलिस अधिकारियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया है। पटना SSP कार्यालय से जारी जानकारी के अनुसार अपर थानाध्यक्ष कदमकुआं अवर निरीक्षक हेमंत झा और चित्रगुप्तनगर थानाध्यक्ष अवर निरीक्षक रोशनी कुमारी को निलंबित किया गया है। दोनों पर आरोप है कि उन्होंने सूचना के बाद भी समय पर उचित कार्यवाही करने में विफलता दिखाई। इस लापरवाही के कारण मामले की जांच प्रभावित हुई और शुरुआती दौर में सही दिशा की जानकारी नहीं मिल सकी।
क्या है पूरा मामला
चित्रगुप्त नगर थाना क्षेत्र में पिछले दिनों नीट की तैयारी कर रही एक छात्रा की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई। घटना की सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची और शव को अपने कब्जे में लिया। शुरुआती जांच के दौरान स्थानीय थाना पुलिस ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों को यह जानकारी दी कि छात्रा की मौत नींद की गोलियों के सेवन से हुई है। यहीं से पूरे मामले पर सवाल उठने लगे। क्योंकि यह जानकारी ऐसे समय दी गई, जब पोस्टमार्टम रिपोर्ट नहीं आई थी,फॉरेंसिक जांच पूरी नहीं हुई थी। इतना ही नहीं मेडिकल बोर्ड की राय सामने नहीं थी लेकिन इसके बावजूद मौत का कारण तय कर लिया गया।
बिना पोस्टमार्टम कैसे तय हो गया कारण?
कानूनी प्रक्रिया के अनुसार किसी भी अप्राकृतिक या संदिग्ध मौत के मामले में पोस्टमार्टम रिपोर्ट को सबसे अहम दस्तावेज माना जाता है। पोस्टमार्टम के बाद ही यह स्पष्ट हो पाता है कि मौत आत्महत्या है, दुर्घटना है या किसी अन्य कारण से हुई है। लेकिन इस मामले में पुलिस ने इस प्रक्रिया को दरकिनार करते हुए जल्दबाज़ी दिखाई। थाना स्तर से जो जानकारी वरिष्ठ अधिकारियों तक भेजी गई, अब वह तथ्यों पर नहीं बल्कि अनुमान पर आधारित प्रतीत होती है।
मीडिया के सामने वरिष्ठ अधिकारियों का बयान
सबसे हैरान करने वाली बात यह रही कि पुलिस से मिली इसी शुरुआती और अपुष्ट जानकारी के आधार पर एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी मीडिया के सामने आए और उन्होंने भी छात्रा की मौत का कारण नींद की गोलियों का सेवन बता दिया।
अब सवाल यह उठता है कि क्या वरिष्ठ अधिकारी बिना ठोस रिपोर्ट के बयान दे सकते हैं? क्या इससे जांच प्रभावित नहीं होती? क्या यह मृत छात्रा और उसके परिवार के साथ अन्याय नहीं है? कानून के जानकार मानते हैं कि इस तरह के बयान न सिर्फ जांच को कमजोर करते हैं, बल्कि बाद में सच सामने आने पर पुलिस की विश्वसनीयता भी खत्म कर देते हैं।
बदली-बदली कहानी और बढ़ता संदेह
जब पोस्टमार्टम रिपोर्ट और अन्य तथ्यों को लेकर सवाल उठने लगे, तब पुलिस की शुरुआती कहानी पर भी संदेह गहराने लगा। इसके बाद परिजनों के दबाव पर छात्रा के शव का पोस्टमार्टम बिहार के सबसे बड़े मेडिकल अस्पताल में किया गया। उसके बाद रिपोर्ट में यह बात सामने आई कि छात्रा के साथ यौन हिंसा की बात से इनकार नहीं किया जा सकता। ऐसे में पहले वाला बयान यहीं से बदला जाना शुरू हो गया। ऐसे में स्थानीय लोगों और छात्रा के परिजनों ने भी मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की। इसके बाद आनन-फानन में SIT बनाई गई। यह टीम शुरुआती कड़ी से अंतिम कड़ी जोड़कर जांच में लगी हुई है। सूत्र बताते हैं कि बीती रात FSL की टीम ने पटना पुलिस या SIT को एक रिपोर्ट सौंपी, जिसमें यह कहा गया कि लड़की के साथ गलत हुआ है। उसके बाद अब आनन-फानन में तीन लोगों को निलंबित कर दिया गया है।
इधर, SHO रोशनी कुमारी को लेकर सोशल मीडिया पर यह भी आरोप लगते रहे हैं कि उन्होंने न सिर्फ मामले को भटकाया, बल्कि पहली सूचना मिलने के बाद भी घटनास्थल से CCTV का DVR लाने के लिए खुद नहीं गईं, बल्कि अपने निजी ड्राइवर को भेजा। इतना ही नहीं, उन्होंने घटनास्थल पर ताला भी काफी दिनों के बाद लगाया, ताकि आराम से सबूतों के साथ झोल करना चाहे आरोपी कर लें। ऐसा कहा जा रहा है कि इसके लिए उन्होंने कुछ लोगों से खास डील भी की। हालांकि, इस बात की आधिकारिक पुष्टि फर्स्ट बिहार नहीं करता है। लेकिन सोशल मीडिया पर ये बातें तेजी से फैल रही हैं। हालांकि अब इस मामले में एक्शन हुआ है, तो लोगों में फिर से न्याय की उम्मीद जगी है, ऐसा भी लिखा जा रहा है।
यह पहला मामला नहीं है जब बिहार पुलिस की कार्यशैली पर सवाल उठे हों। इससे पहले भी कई मामलों में यह आरोप लगते रहे हैं कि पहले एक आसान निष्कर्ष निकाल लिया जाता है, फिर उसी के अनुसार जांच को मोड़ दिया जाता है और बाद में विरोध या सवाल उठने पर चुप्पी साध ली जाती है। चित्रगुप्त नगर का यह मामला भी उसी कड़ी का हिस्सा माना जा रहा है।
परिवार और समाज के लिए क्या मायने?
एक युवा छात्रा, जो डॉक्टर बनने का सपना देख रही थी, उसकी मौत को इस तरह जल्दबाज़ी में “नींद की गोली” बताकर बंद करने की कोशिश कई सवाल खड़े करती है। ऐसे में चित्रगुप्त नगर थाना क्षेत्र में छात्रा की मौत का मामला बिहार पुलिस की कार्यप्रणाली पर एक कड़ा सवाल है। यह घटना बताती है कि जल्दबाज़ी, अधूरी जानकारी और गैर-जिम्मेदार बयानबाज़ी कैसे न्याय की प्रक्रिया को कमजोर कर देती है।